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"क्योंकि दिल कभी व्यापार नहीं करता❤️"

कभी सोचा है,इतनें बड़े शरीर में ईश्वर नें .. "सिर्फ दिल को ही क्यों चुना सम्पूर्ण अंगों को नियंत्रित करनें के लिए??" "क्यों इसको शरीर के केंद्र में स्थान दिया?"  "क्यों ज्यादातर गानें दिल को ही केंद्र में रखकर लिखे गये?"  क्योंकि ..... "ये जो छोटू सा दिल है न बहुत "पवित्र" होता है,वो व्यापार नहीं करता.." "सबको बिना किसी भेदभाव के  एक समान सम्मान देता है..".  ये छोटू सा दिल जहां आकर सारी अशुद्धियां स्वत: शुद्ध हो जाती हैं.... अपनीं सारी पवित्रता को ये सभी में भेदभावरहित होकर बांट देता है..…इसीलिए ईश्वर नें इसको शरीर का "मुखिया" बनाया ताकि इसके नियंत्रण में शरीर के बाकी अंग सुचारू रूप से चलते रहें।शायद इसीलिए कहा जाता है कि.. ... "किसी से जुड़ना हो तो दिल से जुड़ो क्योंकि दिल से बनाए रिश्ते ,दिमाग के बनाए रिश्तों से ज्यादा टिकाऊ और सुकून देंनें वाले होतें हैं अपनीं पवित्रता की वजह से..." . इसीलिए जो दिल की सुनतें हैं वो हमेशा खुश रहतें हैं... आप भी अपनें दिल की सुनिये और उसकी हिफाजत अच्छे से कीजिए ❤️❤️❤️❤️ #I...

बस.. इतना ही तो करते हो आप!!!

बस... इतना ही तो करते हो आप!! दिमाग में दुनिया भर की टेंशन और दिल में बच्चों की फिक्र बस... इतना ही तो करते हो आप!! खुद सादगी के साथ रहकर लोगों की हर जरूरतें पूरी करते हो बस... इतना ही तो करते हो आप!!! जब भी किसी को दुखी देखा उसकी झोली में खुशियां डाल देते हो बस... इतना ही तो करते हो आप!!! सिर पर आई हर जिम्मेदारियों को हरवक्त बखूबी निभाते हो बस... इतना ही तो करते हो आप!!! ढेरों परेशानियों के बावजूद परिवार को साथ लेकर चलते हो बस... इतना ही तो करते हो आप!!! संकुचित सोच के दायरे में न बंधकर हमेशा प्रोग्रेशिव सोच रखते हो बस... इतना ही तो करते हो आप!!! अपनें और पराये के झगड़े में न पड़कर सबके हित की बात सोचते हो बस .….इतना ही तो करते हो आप!! कदम कदम पर लोगों द्वारा छले जानें पर दिल ही दिल में रो लेते हो बस ... इतना ही तो करते हो आप!!! (मधु) आपको समझनें के लिए आपके जैसा innocent मन और सोच चाहिए, पापा Proud of u❤️❤️

स्त्री होनें का मतलब!!!!!

हर नारी के क्यों भाग्य लिखी यह अग्नि-चिता ?     क्यों दूध–धुला हर पुरुष ,कहाँ उसकी शुचिता ?.... रामायण की सीता हो या महाभारत की द्रौपदी,दोनों का ही प्रकरण जब भी मैंनें पुस्तकों में पढ़ा या टीवी पर देखा ,अत्यधिक पीड़ा से गुजरा मेरा मन...कभी भी मेरा मन इसमें दी गयी उन दलीलों से संतुष्ट नहीं हुआ जो सीता की अग्नि परीक्षा,सीता का त्याग या द्रौपदी के चीरहरण के वक्त दी गयी...... रामायण हो या महाभारत दोनों ही महाकाव्य हम मनुष्यों के जीवन में विशेष स्थान रखतें हैं,लोग श्रीराम को मर्यादा पुरूषोत्तम और युधिष्ठर को धर्मराज मानकर उनके पद्चि्हो पर चलनें की कोशिश करतें हैं.....निश्चत रूप से ये दोनों पुरूष एक महान और आदर्श पुरूष थे जिनका अनुकरण किया जाना चाहिए... परन्तु मुझे लगता है इन दोनों ही महाकव्यों में नारी के सम्मान को उचित स्थान नहीं दिया गया.... एक को आदर्श बनानें के चक्कर में दूसरे की पीड़ा को नजर अंदाज कर दिया गया... "अग्नि परीक्षा" के वक्त यह तर्क देकर लोगों को संतुष्ट करनें का प्रयास किया गया कि सीताहरण के पूर्व श्रीराम नें मां सीता को अग्नि को सौंपा था,इसलिए सीता को...

आधुनिकता और बराबरी की ओर बढ़ते हम!!!!!!!!

जी हां, बड़ी तेजी से आधुनिक हो रहें हैं, हमनें हमारे ऊपर लगे "गंवारपन" के ठप्पे को अब उतार के फेंक दिया है और हर उस चीज को अपनाना शुरू कर दिया है जो हमें आधुनिकता की श्रेणी में लाकर खड़ा करता है। मैंने यहीं कहीं पढ़ा कि 'महिलाएं भी अब आधी रात को शराब की दुकानों में जाकर धड़ल्ले से शराब खरीदती ,और पीती है .. सिगरेट पीना और कई पुरूषों के साथ संबंध बना लेनें में भी अब उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं होती.... हो भी क्यों क्या हम पुरूषों से किसी मामले में कम हैं!!आज हर जगह ,हर फील्ड में हम पुरूषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रहें हैं तो यहां क्यूं नही??? मुझे याद है फिल्म  "कबीर सिंह"देखनें के बाद फिल्म  पर चिंता व्यक्त करते हुए मैनें  कहा था कि "ये हम कैसा समाज दिखा रहें हैं जिसमें एक डाक्टर को शराब पीकर आपरेशन करते दिखाया गया है ???"फिर हमनें इसी प्रश्न का उत्तर देते हुए किसी का कंमेंट पढ़ा कि आदमी जब प्यार में होता है तो वो कुछ भी कर सकता है,और वो वाजिब भी है.... सही तो है इसी को तो सच्चा प्यार कहतें हैं!!! इस सच्चे प्यार की आड़ में लोग बड़े बड़े कुकृत्य भी कर...