स्त्री होनें का मतलब!!!!!

हर नारी के क्यों भाग्य लिखी यह अग्नि-चिता ?
    क्यों दूध–धुला हर पुरुष ,कहाँ उसकी शुचिता ?....

रामायण की सीता हो या महाभारत की द्रौपदी,दोनों का ही प्रकरण जब भी मैंनें पुस्तकों में पढ़ा या टीवी पर देखा ,अत्यधिक पीड़ा से गुजरा मेरा मन...कभी भी मेरा मन इसमें दी गयी उन दलीलों से संतुष्ट नहीं हुआ जो सीता की अग्नि परीक्षा,सीता का त्याग या द्रौपदी के चीरहरण के वक्त दी गयी......
रामायण हो या महाभारत दोनों ही महाकाव्य हम मनुष्यों के जीवन में विशेष स्थान रखतें हैं,लोग श्रीराम को मर्यादा पुरूषोत्तम और युधिष्ठर को धर्मराज मानकर उनके पद्चि्हो पर चलनें की कोशिश करतें हैं.....निश्चत रूप से ये दोनों पुरूष एक महान और आदर्श पुरूष थे जिनका अनुकरण किया जाना चाहिए... परन्तु मुझे लगता है इन दोनों ही महाकव्यों में नारी के सम्मान को उचित स्थान नहीं दिया गया.... एक को आदर्श बनानें के चक्कर में दूसरे की पीड़ा को नजर अंदाज कर दिया गया...
"अग्नि परीक्षा" के वक्त यह तर्क देकर लोगों को संतुष्ट करनें का प्रयास किया गया कि सीताहरण के पूर्व श्रीराम नें मां सीता को अग्नि को सौंपा था,इसलिए सीता को वापस लेनें के लिए यह सब नाटक हुआ,चलो मान लिया...पर सीता का त्याग किसलिए???केवल अपनी प्रजा के अनर्गल आरोपों का मान रखकर उन्हें संतुष्ट करनें के लिए!!! माना राजा का प्रथम कर्तव्य प्रजा का ध्यान रखना ,और अपनें हितों का त्याग करना होता है,पर राजा का अपनी पत्नीं के प्रति कोई कर्तव्य नहीं रह जाता राजा बननें के बाद,उसके बाद प्रजा का निर्णय ही सर्वोपरि हो जाता है!!!माना कि राजा को अपनें धर्म का पालन करते हुए अपनें कुल की कीर्ति को बढ़ाना चाहिए और एक आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए परन्तु क्या श्रीराम द्वारा मां सीता की बार बार अग्नि परीक्षा लेकर और सीता का त्याग करके रघुकुल की कीर्ति बढ़ी थी??? और उन्होनें समाज के सामनें कोई आदर्श प्रस्तुत किया था???भले ही इसमें कई तर्क दिये गये और सीता द्वारा सहमति भी दिखाई गयी ,और सीता त्याग के बाद श्रीराम का सन्यासिओं की तरह दिखाया गया पर मेरा मन सारे तर्क को सिरे से नकारता है...कुल मिलाकर निरअपराध सीता जी को सजा तो मिली न!!.... और श्रीराम नें अपनी प्रजा के सामने भी तो यही उदाहरण प्रस्तुत किया कि स्त्री की गलती न होंनें पर भी लोगों के भय वश उसे ही सजा भुगतनीं होगी... और ऐसा ही होता आ रहा है आज भी...
.मर्यादा के नाम पर,धर्म के नाम पर हमेशा से स्त्रियों को ही हर पीड़ा से गुजरना होता है.... पुरूषों को तो मर्यादा या धर्म की रक्षा के नाम पर हमेशा से माफी मिलती ही रही है..... मुझे समझ नहीं आता कब तक स्त्रियों को केवल एक वस्तु समझा जाता रहेगा??आप जब चाहें तब अपनें पुरूषत्व को संतुष्ट करनें के लिए उसका उपभोग करलो चाहे उसकी इच्छा हो या न हो,,जब तक वो आपकी इच्छानुसार चले तो वो आदर्श नारी,अन्यथा वो परिणाम/पीड़ा भुगतनें को तैयार रहे,ये स्थिती आज भी ज्यादातर स्त्रियों की है,भले ही वो कितनीं भी पढ़ी लिखी क्यों न हों.
मेरा अपना मानना है कि सीता जी को भी उस वक्त विरोध करना चाहिए था....उन्हें उन बेबुनियाद आरोपों के समक्ष डटकर खड़े होना था,न कि चुपचाप सबकुछ सहते हुए अपनें को समाप्त कर लेना था.... आज भी अगर स्त्रियां हिम्मत नहीं दिखायेंगी तो फिर ऐसी कयी अग्नि परीक्षा के लिए स्वयं को तैयार रखें!!!!!!! 
"मधु"

Comments

  1. Bilkul yahi ham ko bhi lagta hai. Bahot hi achcha likha hai. Keep it up.

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